
लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। कालजयी गद्य पद्य की रचनाओं की श्रृंखला पेश करने वाले मुंशी प्रेमचंद की जन्म जयंती पर काव्य रचनाओं की बौछारों से याद किया गया।
शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के बलिया में जन्मे अभिषेक मिश्र ने छोटी सी उम्र में साहित्यिक दुनिया में लेखनी की बौछार करना शुरू कर दिया। उन्होंने मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर काव्य रचनाओं के माध्यम से याद करते हुए लिखा कि
दिलों के ज़ख़्म सीने में छुपा कर कौन चलता है,
अंधेरी रात में हल्कू को तन्हा छोड़ कर कौन चलता है।।
ज़माने की हवा का रुख़ ज़रा सा क्या बदला,
निगाहें फेर कर अपनों से मुँह मोड़ कर कौन चलता है।।
सुना है बिक नहीं सकती कभी ज़मीर की दौलत,
तो फिर बाज़ार में ऐसे में ईमान तोल कर कौन चलता है।।
वो ‘गोदान’ का होरी हो कि ‘नमक का दरोगा’ वंशीधर,
अरे! इस दौर में ऐसी शराफ़त ओढ़ कर कौन चलता है।।
कसम खाई है जिसने भी कलम को सच लिखने की,
वो आंधियों के साए में भी सर को जोड़ कर कौन चलता है।।
उजाले की तलाश में भटकते हैं सभी लेकिन,
दिए की लौ पे परवाना पिघल कर कौन चलता है।।
यही मुंशी की दुनिया है, यहीं गोदान की पीड़ा,
सवालों के समंदर में भँवर को तोड़ कर कौन चलता है।।
अगर पूछो कि मुंशी की विरासत आज क्या होगी,
जहाँ अन्याय हो, उसके विरुद्ध होकर कौन चलता है।।
सलाम उस फ़न के सौदागर, सलाम उस सोच के मालिक,
जो इंसाँ को ही मज़हब मानकर हरदम चला करता।।
नमन उस कलम को, जिसने हमें इंसाँ बनाया है,
वरना भीड़ के पीछे तो हर कोई चला करता।।
न बिका वो लालच के आगे, न झुका किसी दरबार के आगे,
वो ‘नमक का दरोगा’ बन के खड़ा रहा हर तलवार के आगे।।
तो गूँजनी चाहिए ऐसी ताली इस पूरी महफ़िल में आज,
कि काँप उठे ये झूठी दुनिया, देख के उसका हर अंदाज़।
अरे! ज़िंदा है वो आज भी हर दिल में, हर इक किरदार के साथ,
नमन है उस महानायक को, जिसने थामी थी सच की हाथ।।
अभिषेक मिश्र की काव्य रचनाओं ने न केवल साहित्यिक में रूचि है बल्कि समाज को आईना दिखाने वाली सोच को दर्शाता है।



