प्रो. केएन कौल स्मृति व्याख्यान
देश की बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। राजधानी में प्रो. केएन कौल स्मृतियों को स्मरण किया गया।
शनिवार को लोटस प्रेक्षागृह, केएन कौल ब्लॉक में 9वें प्रो. केएन कौल स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर डॉ. हिमांशु पाठक, महानिदेशक,
अंतर्राष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (आईसीआरआईसैट), हैदराबाद ने मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होकर स्मृति व्याख्यान प्रस्तुत किया। ज्ञात हो कि
यह स्मृति व्याख्यान श्रृंखला प्रो. कैलाश नाथ कौल (1905–1983) की गौरवशाली विरासत को समर्पित रहा। प्रो. कौल राष्ट्रीय वनस्पति उद्यान (वर्तमान सीएसआईआर–एनबीआरआई) के संस्थापक निदेशक,
प्रख्यात वनस्पतिविद्, उद्यानविद्, कृषि वैज्ञानिक एवं पर्यावरण चिंतक थे। जिनके सतत कृषि, जैव विविधता संरक्षण तथा प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन संबंधी दूरदर्शी योगदान आज भी वैज्ञानिक समुदाय को प्रेरित करते हैं। वहीं
कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए संस्थान निदेशक डॉ. एके. शासनी ने कहा कि प्रो. केएन कौल स्मृति व्याख्यान श्रृंखला संस्थान की एक महत्वपूर्ण पहल है।
जिसका उद्देश्य प्रो. कौल की उस विलक्षण विरासत का सम्मान करना है। जिसमें पादप विज्ञान, कृषि, पर्यावरण संरक्षण एवं सामाजिक कल्याण के बहुआयामी दृष्टिकोण का समावेश है।
“फूड टू न्यूट्रिशन, इनकम एंड एनवायरनमेंट सिक्योरिटी नेक्स्ट-जेनरेशन एग्रीकल्चर” विषय पर स्मृति व्याख्यान देते हुए डॉ. हिमांशु पाठक ने कहा कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और देश की बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1950 के दशक में देश खाद्यान्न की कमी से जूझ रहा था। वर्ष 2000 तक भारत ने खाद्य आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली तथा वर्ष 2010 तक खाद्य अधिशेष राष्ट्र के रूप में उभरकर सामने आया। जिससे करोड़ों लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना संभव हो सका।
उन्होंने कहा कि पिछले सात दशकों में भारत का खाद्य उत्पादन लगभग सात गुना बढ़ा है। जबकि कृषि योग्य क्षेत्रफल में बहुत अधिक वृद्धि नहीं हुई है।
इसी अवधि में दुग्ध, मत्स्य, फल एवं सब्जी उत्पादन में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है और कई कृषि उत्पादों के क्षेत्र में भारत आयातक से निर्यातक देश के रूप में स्थापित हुआ है।
डॉ. पाठक ने कहा कि इसके बावजूद बढ़ती जनसंख्या, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण तथा तेजी से बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य के कारण भारतीय कृषि अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि बदलते भू-राजनीतिक हालातों ने भविष्य के लिए अधिक सुदृढ़ एवं लचीली कृषि प्रणालियों की आवश्यकता को और अधिक स्पष्ट कर दिया है।
नेक्स्ट-जेनरेशन एग्रीकल्चर के महत्व पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि उत्पादकता, लाभप्रदता एवं सततता में एक साथ सुधार लाने के लिए कृषि के एक परिवर्तनकारी मॉडल को अपनाना आवश्यक है, जो ऊर्जा एवं पोषक तत्वों की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर सके।
उन्होंने कहा कि इन उद्देश्यों की प्राप्ति में अनुसंधान, नवाचार तथा उन्नत तकनीकों का उपयोग अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
डॉ. पाठक ने जीनोम एडिटिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), रोबोटिक्स, ड्रोन, रिमोट सेंसिंग, बिग डेटा एनालिटिक्स एवं प्रिसिजन एग्रीकल्चर जैसी अत्याधुनिक तकनीकों की परिवर्तनकारी क्षमता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ये तकनीकें जलवायु परिवर्तन, संसाधनों की सीमित
उपलब्धता तथा बदलती उपभोक्ता आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक सक्षम, लचीली एवं टिकाऊ कृषि-खाद्य प्रणालियों के निर्माण में सहायक सिद्ध होंगी। उन्होंने कहा कि भविष्य की कृषि को उत्पादक, संरक्षक, पूर्वानुमान आधारित, परिशुद्ध एवं लाभकारी होना चाहिए। जिससे खाद्य, पोषण, आय एवं पर्यावरणीय सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
उन्होंने जलवायु-अनुकूल फसलों, डिजिटल कृषि, स्मार्ट कृषि परामर्श सेवाओं, सुदृढ़ कृषि विस्तार तंत्र, मूल्य श्रृंखला विकास तथा अनुसंधान संस्थानों, उद्योग जगत एवं कृषक समुदाय के मध्य सहयोगात्मक साझेदारी
को वर्ष 2047 तक विकसित एवं आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक बताया। इस अवसर पर डॉ. पाठक ने आधुनिक एवं सतत कृषि के क्षेत्र में आईसीआरआईसैट द्वारा किए जा रहे प्रमुख अनुसंधानों, नवाचारों एवं उपलब्धियों की भी जानकारी साझा की।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. पूनम सी. सिंह, वैज्ञानिक एफ, सीएसआईआर–एनबीआरआई ने धन्यवाद ज्ञापित किया।



