अहंकार का त्याग सच्चे आध्यात्मिक जीवन का आधार – मुक्तिनाथानन्द
संतों व महापुरुषों ने बताया अहंकार जीवन का सबसे बड़ा बंधन

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। अहंकार का त्याग सच्चे आध्यात्मिक जीवन का आधार बताया गया।
रविवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि मानव जीवन में अहंकार एक ऐसी शक्ति है, जो व्यक्ति को ऊँचाइयों तक भी ले जा सकती है और पतन का कारण भी बन सकती है।
संतों और महापुरुषों ने अहंकार को जीवन का सबसे बड़ा बंधन बताया है। प्रस्तुत विचारों में ठाकुर ने अहंकार के दो स्वरूप बताए हैं। “कच्चा अहंकार” और “पक्का अहंकार”।
कच्चा अहंकार मनुष्य को संसार के बंधनों में बाँधता है। जबकि पक्का अहंकार उसे ईश्वर और मोक्ष की ओर ले जाता है। कच्चा अहंकार वह है जिसमें व्यक्ति स्वयं को शरीर, धन, पद और प्रतिष्ठा से जोड़कर देखता है।
वह अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है। इस प्रकार का अहंकार मनुष्य के भीतर लोभ, क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष को जन्म देता है। इसके विपरीत पक्का अहंकार वह है जिसमें व्यक्ति अपने को ईश्वर का सेवक, भक्त या बालक मानता है।
यह अहंकार मनुष्य को विनम्र बनाता है और उसके भीतर प्रेम तथा करुणा का विकास करता है।
श्रीरामकृष्ण परमहंस ने ने बच्चों के अहंकार को “पक्का अहंकार” कहा है। एक छोटे बच्चे में छल-कपट, द्वेष या दिखावा नहीं होता। वह स्वभाव से सरल और निष्कपट होता है।
उसका मन निर्मल होता है, इसलिए वह गुणातीत माना जाता है। बच्चा थोड़ी देर रोता है और फिर तुरंत हँसने लगता है। उसके मन में किसी के प्रति बैर नहीं रहता। यही बालकवत स्वभाव आध्यात्मिक जीवन में आदर्श माना गया है।
इसके विपरीत वृद्धावस्था का अहंकार अधिक जटिल और बंधनकारी बताया गया है। इसे “अष्टपाश” से युक्त कहा गया है। इन आठ बंधनो में लज्जा, घृणा, भय, कुल, शील, वित्त, शंका और जुगुप्सा।
मनुष्य इन बंधनों में फँसकर अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है। वह समाज, प्रतिष्ठा और धन के मोह में इतना उलझ जाता है कि ईश्वर से उसका संबंध कमजोर पड़ जाता है।
धन का अहंकार भी मनुष्य को अंधा बना देता है। एक छोटी-सी संपत्ति या सफलता व्यक्ति के भीतर घमंड पैदा कर देती है। वह दूसरों को तुच्छ समझने लगता है।
यह अहंकार वास्तविकता को ढक देता है और मनुष्य को सत्य से दूर कर देता है। इतिहास गवाह है कि धन और शक्ति के घमंड ने अनेक लोगों का पतन किया है।
अहंकार से मुक्ति का उपाय केवल बाहरी प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए निरंतर आत्मचिंतन, प्रार्थना और अभ्यास की आवश्यकता होती है। जब मनुष्य ईश्वर के सामने स्वयं को छोटा मानता है, तब उसके भीतर विनम्रता का जन्म होता है।
धीरे-धीरे उसका कच्चा अहंकार समाप्त होने लगता है और वह पक्के अहंकार की ओर बढ़ता है। स्वामी मुक्तिनाथानंद ने बताया कि कहा जा सकता है कि अहंकार का पूर्ण त्याग ही सच्चे आध्यात्मिक जीवन का आधार है।
बालक जैसी सरलता, निष्कपटता और विनम्रता अपनाकर ही मनुष्य ईश्वर के निकट पहुँच सकता है और जीवन में वास्तविक शांति तथा आनंद प्राप्त कर सकता है।



