चिकित्सकीय सलाह का पालन मां और बच्चे की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी- डॉ एनबी सिंह
प्रसव पीड़ा शुरू होने का इंतजार करना होता जोखिम

लखनऊ,भारत प्रकाश न्यूज़। प्रसव पीड़ा में लापरवाही करना कठिनाइयों को बुलाने जैसा बताया गया। बदला हुआ नाम सीमा जिन्हे
गर्भावस्था के नौ महीने पूरे हो चुके थे, लेकिन अस्पताल जाने को तैयार नहीं थी। आशा कार्यकर्ता ने कई बार समझाया, फिर भी उसका कहना था कि प्रसव पीड़ा शुरू होने पर ही वह अस्पताल जाएगी।
करीब दस दिन बाद जब उसे असहज महसूस हुआ, तब वह अस्पताल पहुंची। जांच में पता चला कि गर्भाशय में पानी काफी कम हो चुका था और बच्चे ने गर्भ में ही मल त्याग कर दिया था। स्थिति गंभीर थी। चिकित्सकों ने जरूरी प्रयास कर सुरक्षित प्रसव कराया। मां और बच्चा, दोनों स्वस्थ रहे।
यह मामला बताता है कि प्रसव पीड़ा शुरू होने का इंतजार करना कितना जोखिम भरा हो सकता है। गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच कराना और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार समय पर अस्पताल पहुंचना मां और बच्चे की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। बुधवार को
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एनबी सिंह ने कहा कि गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच और प्रसव के समय चिकित्सकीय सलाह का पालन मां और बच्चे की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।
नियमित जांच से संभावित जटिलताओं की समय रहते पहचान की जा सकती है और जरूरत पड़ने पर उचित उपचार दिया जा सकता है।
उन्होंने गर्भवती महिलाओं और उनके परिजनों से अपील की कि वे प्रसव पीड़ा शुरू होने का इंतजार करने के बजाय चिकित्सकीय सलाह के अनुसार समय पर अस्पताल पहुंचें। इससे चिकित्सकों को मां और बच्चे की स्थिति के अनुरूप सही निर्णय लेने और जरूरी उपचार उपलब्ध कराने का पर्याप्त समय मिल सकेगा।
सीएचसी सिल्वर जुबली की अधीक्षक डॉ. प्रियंका के मुताबिक, गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच सुनिश्चित करना आज भी चुनौती है। कई महिलाएं पहली जांच के बाद दो से चार महीने तक अस्पताल नहीं आतीं।
आशा कार्यकर्ताओं के बार-बार समझाने के बावजूद वे जांच को जरूरी नहीं समझतीं, क्योंकि उन्हें कोई परेशानी महसूस नहीं होती। ऐसे में गर्भावस्था के दौरान होने वाली संभावित जटिलताओं का समय पर पता लगाना मुश्किल हो जाता है।
डॉ. प्रियंका ने बताया कि प्रसव के समय चिकित्सकीय सलाह के अनुसार निर्णय लेने में देरी भी मां और बच्चे के लिए जोखिम बढ़ा सकती है। उन्होंने एक अन्य मामले का जिक्र करते हुए बताया कि गर्भावस्था की पूरी अवधि होने के बाद सावित्री (बदला हुआ नाम) अस्पताल पहुंची थीं।
बच्चे की स्थिति को देखते हुए चिकित्सकों ने सिजेरियन प्रसव की सलाह दी, लेकिन महिला और उनके परिजन इसके लिए तैयार नहीं थे। जब प्रसव पीड़ा असहनीय हो गई, तब वे सिजेरियन प्रसव के लिए राजी हुए।
उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में जरूरी चिकित्सकीय निर्णय लेने में देरी से मां और बच्चे, दोनों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
डॉ. प्रियंका के अनुसार, सीएचसी सिल्वर जुबली में हर महीने औसतन 90 प्रसव होते हैं। इनमें जिसमें लगभग 60 सामान्य और लगभग 30 सिजेरियन प्रसव शामिल हैं। एक या दो गर्भवती महिलाओं को ही उच्च स्वास्थ्य केंद्र रेफर करने की जरूरत पड़ती है।



