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मनुष्य का वास्तविक स्वरूप भीतर विद्यमान अमर आत्मा- मुक्तिनाथानन्द 

जीवन का उद्देश्य आत्मा को पहचानना

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। शरीर में विद्यमान अमर आत्मा को बोध कराया गया। मंगलवार को प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर नहीं, बल्कि उसके भीतर विद्यमान अमर आत्मा है।

शरीर केवल आत्मा का निवास-स्थान है, जबकि आत्मा शाश्वत, अविनाशी और परम सत्य है। यदि मनुष्य इस सत्य को समझ ले, तो उसका जीवन आध्यात्मिक शांति, विवेक और ईश्वर-प्रेम से भर सकता है।

स्वामी ने श्रीरामकृष्ण परमहंस के जीवन की एक प्रेरणादायक घटना का उल्लेख किया गया है। जिसमें डॉ. महेंद्रलाल सरकार और रामकृष्ण के बीच हुई चर्चा के माध्यम से यह बताया गया कि भगवान के प्रति सच्चा प्रेम और तड़प ही आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।

जब साधक का हृदय ईश्वर की ओर पूरी तरह समर्पित हो जाता है, तब संसार के आकर्षण स्वतः फीके पड़ने लगते हैं। यही भक्ति मनुष्य को आत्मिक उन्नति की ओर ले जाती है। शरीर और आत्मा के संबंध को समझाने के लिए रामकृष्ण द्वारा दिए गए नारियल के उदाहरण का उल्लेख अत्यंत प्रभावशाली है।

जब नारियल कच्चा होता है, तब उसका गूदा खोल से चिपका रहता है; लेकिन सूख जाने पर गूदा खोल से अलग हो जाता है। उसी प्रकार जब मनुष्य संसार की आसक्ति, मोह और वासनाओं से ऊपर उठता है, तब वह अनुभव करता है कि आत्मा शरीर से भिन्न और स्वतंत्र है।

यह वैराग्य संसार से भागना नहीं, बल्कि उसके बीच रहते हुए भी उससे अनासक्त रहने की कला है। स्वामी ने‘कामिनी-कांचन’ अर्थात् इन्द्रिय-भोग और धन के अत्यधिक मोह से सावधान रहने का संदेश दिया।

जब तक मनुष्य इन आसक्तियों में बँधा रहता है, तब तक आत्मा के वास्तविक स्वरूप का अनुभव कठिन होता है। इसलिए आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य संसार का त्याग नहीं, बल्कि उसके प्रति संतुलित और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण विकसित करना है।

स्वामी ने श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय का उल्लेख करते हुए समझाया कि शरीर जन्म लेता है, बढ़ता है, वृद्ध होता है और अंततः नष्ट हो जाता है,फिर भी आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है। वह नित्य, शाश्वत, अजर और अमर है।

मनुष्य यदि स्वयं को केवल शरीर मानता है, तो भय, दुःख और मृत्यु की चिंता उसे सताती रहती है। किंतु जब वह अपने आत्मस्वरूप का बोध करता है, तब उसके भीतर निर्भयता, शांति और स्थिरता का उदय होता है।

जबकि शरीर की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। शरीर आध्यात्मिक साधना का साधन है, इसलिए उसकी उचित देखभाल आवश्यक है। स्वस्थ शरीर, शुद्ध मन और ईश्वर-स्मरण,ये तीनों मिलकर साधक को आत्मज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं।

शरीर की सेवा आवश्यक है, परंतु स्वयं को केवल शरीर मान लेना अज्ञान है। स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक सुख-सुविधाएँ प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपने भीतर स्थित आत्मा को पहचानना और ईश्वर से अपना संबंध स्थापित करना है।

जब मनुष्य संसार की क्षणभंगुर वस्तुओं से ऊपर उठकर सत्य, प्रेम, भक्ति और वैराग्य का मार्ग अपनाता है, तब उसे अपने अमर स्वरूप का अनुभव होने लगता है। यही वेदान्त का सार है और यही श्रीरामकृष्ण की शिक्षाओं का मूल संदेश भी है कि आत्मा ही हमारा वास्तविक स्वरूप है, शरीर केवल उसका अस्थायी निवास है।

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