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केजीएमयू में प्रिसीजन मेडिसिन यूनिट का शुभारंभ 

 अब तक यूनिट की प्रयोगशाला में 80 हज़ार से अधिक हुई जाँचे

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। केजीएमयू में प्रिसीजन मेडिसिन यूनिट की शुरुआत की गई।

गुरुवार को प्रेसवार्ता के दौरान कुलपति प्रोफेसर सोनिया नित्यानंद द्वारा क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की प्रिसीजन मेडिसिन यूनिट का औपचारिक उद्घाटन किया। वहीं प्रेसवार्ता के दौरान प्रो अविनाश अग्रवाल विभागाध्यक्ष, क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग एवं

प्रो केके सिंह प्रोफेसर, सर्जरी विभाग, प्रभारी, मीडिया सेल, प्रो प्रेमराज सिंह, डॉ शांतनु समेत अन्य चिकित्सक मौजूद रहे। वहीं कुलपति ने प्रीसीजन मेडिसिन अन्य विभागों में शुरू करने की बात कही।

साथ ही उन्होंने कहा यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। इससे मरीजों की सटीक तरीके से बीमारी की पहचान कर उपचार प्रदान किया जायेगा।

उत्तर प्रदेश सरकार ने संस्थान के क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की प्रिसीजन मेडिसिन यूनिट को इसी वर्ष बीते 13 अक्टूबर को ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस प्रिसीजन मेडिसिन इन एक्यूट केयर’ घोषित किया है।

यह उपलब्धि गंभीर एवं आपातकालीन रोगियों के उपचार में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों और व्यक्तिगत उपचार पद्धतियों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

प्रो अग्रवाल ने कहा कि प्रिसीजन मेडिसिन यूनिट कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद की दूरदर्शी सोच एवं महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसका उद्देश्य आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान एवं उन्नत चिकित्सा तकनीकों को रोगियों के उपचार से जोड़ना तथा प्रिसीजन मेडिसिन को आम नागरिकों के लिए सुलभ एवं किफायती बनाना है।

कुलपति के मार्गदर्शन एवं विश्वविद्यालय के संस्थागत सहयोग से यह पहल गंभीर एवं आपातकालीन चिकित्सा के क्षेत्र में एक अग्रणी केंद्र के रूप में विकसित हुई है। इस यूनिट की परिकल्पना कोविड-19 महामारी के अनुभवों के बाद वर्ष 2021 में की गई थी।

वर्ष 2022 में केजीएमयू की कार्यकारी समिति से स्वीकृति तथा वर्ष 2023 में उत्तर प्रदेश सरकार से मंजूरी प्राप्त होने के बाद इस यूनिट ने उन्नत निदान, नैदानिक सेवाओं एवं अनुसंधान के क्षेत्र में निरंतर प्रगति की है।

वर्ष 2023 से अब तक प्रिसीजन मेडिसिन यूनिट की प्रयोगशाला में 80,हज़ार से अधिक जाँचे की जा चुकी हैं। इनमें मल्टीप्लेक्स पीसीआर बायोमार्कर विश्लेषण, फार्माकोजेनोमिक परीक्षण तथा अन्य विशिष्ट जाँचे शामिल है।

इस यूनिट के माध्यम से कम समय में सटीक निदान..

मल्टीप्लेक्स पीसीआर तकनीक के माध्यम से लगभग 8 घंटे में उपयोगी नैदानिक जानकारी प्राप्त की जा सकती है। जबकि पारंपरिक कल्चर आधारित जाँचों में लगभग 72 घंटे लग सकते हैं।

इससे गंभीर रोगियों में संक्रमण की शीघ्र पहचान तथा समय पर उचित उपचार संबंधी निर्णय लेने में सहायता मिलती है। वहीं यूनिट द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, लगभग 30-40 लक्ष्यों की जाँच करने वाली एक

मल्टीप्लेक्स मॉलिक्यूलर स्क्रीनिंग जाँच संस्थान में लगभग ₹2,000 में उपलब्ध है। जबकि कॉर्पोरेट क्षेत्र में इसकी अनुमानित लागत ₹15,000 है। यह सार्वजनिक चिकित्सा संस्थानों में उन्नत जाँच सुविधाओं को कम लागत पर उपलब्ध कराने की क्षमता को दर्शाता है।

केंद्र ने फार्माकोजेनोमिक सेवाएँ प्रारंभ की हैं। इनके माध्यम से यह समझने में सहायता मिलती है कि किसी व्यक्ति के आनुवंशिक गुण विभिन्न दवाओं की प्रभावशीलता, शरीर में उनके प्रभाव तथा दुष्प्रभावों को किस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं।

इससे रोगियों के लिए अधिक व्यक्तिगत एवं उपयुक्त उपचार निर्धारित करने की दिशा में सहायता मिलती है। यूनिट ने उन दवाओं के लिए थेराप्यूटिक ड्रग मॉनिटरिंग सेवा शुरू की है, जिनके लिए उपयुक्त जाँच उपलब्ध हैं।

इससे रक्त में दवा की मात्रा का आकलन कर उसकी खुराक को बेहतर ढंग से निर्धारित करने तथा उपचार की विफलता और दवा के विषाक्त प्रभावों के जोखिम को कम करने में सहायता मिल सकती है।

एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस पर नियंत्रण में केंद्र का उद्देश्य आधुनिक मॉलिक्यूलर तकनीकों के माध्यम से रोग पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों तथा उनमें मौजूद दवा प्रतिरोधी जीन की पहचान को सुदृढ़ करना है।

इसके साथ ही, दवा प्रतिरोध संबंधी डेटाबेस विकसित करने, वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित एंटीबायोटिक नीतियाँ बनाने तथा एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने पर कार्य किया जा रहा है।

प्रो अग्रवाल में बताया कि यह उपलब्धि संस्थान प्रशासन के सहयोग तथा क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की पूरी टीम के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। इसमें संकाय सदस्यों, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, रेजिडेंट डॉक्टरों, नर्सिंग कर्मियों, तकनीशियनों तथा माइक्रोबायोलॉजी विभाग के सहयोगियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

इस यूनिट की भविष्य में तैयारी..

केंद्र की भविष्य की प्रमुख योजनाओं में नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग तकनीक विकसित करना शामिल है। इसके माध्यम से उन्नत आनुवंशिक अनुसंधान, रोगजनकों की पहचान, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के तंत्रों का अध्ययन,

फार्माकोजेनोमिक्स तथा जीनोमिक निगरानी को बढ़ावा दिया जाएगा। केंद्र की योजना प्रदेश के सरकारी चिकित्सा महाविद्यालयों के डॉक्टरों, रेजिडेंट्स, नर्सिंग कर्मियों एवं प्रयोगशाला कर्मचारियों को प्रिसीजन मेडिसिन के विभिन्न पहलुओं में प्रशिक्षित करने की है।

इस कार्यक्रम में मौजूदा प्रयोगशालाओं, उपकरणों एवं उपलब्ध आधारभूत संरचना का अधिकतम उपयोग किया जाएगा, ताकि प्रत्येक संस्थान में अलग से महँगी प्रयोगशालाएँ एवं उपकरण स्थापित करने पर अनावश्यक खर्च से बचा जा सके।

केंद्र द्वारा आणविक निदान , प्रिसीजन एंटीमाइक्रोबियल थेरेपी, फार्माकोजेनोमिक्स, थेराप्यूटिक ड्रग मॉनिटरिंग तथा जीनोमिक मेडिसिन जैसे क्षेत्रों में 3-6 माह की संरचित फेलोशिप शुरू करने की योजना है।

इन कार्यक्रमों का उद्देश्य विशेषज्ञता विकसित करना, व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करना तथा प्रदेश में प्रिसीजन मेडिसिन के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करना होगा। कार्यक्रमों को आवश्यक संस्थागत स्वीकृति के बाद प्रारंभ किया जाएगा।

भविष्य में बायोमार्कर आधारित शीघ्र निदान, भारतीय जनसंख्या के अनुरूप फार्माकोजेनोमिक डेटाबेस का विकास, माइक्रोबायोम अनुसंधान तथा प्रिसीजन मेडिसिन की नई उपचार पद्धतियों के वैज्ञानिक मूल्यांकन पर विशेष ध्यान दिया जायेगा।

केंद्र का लक्ष्य उत्तर प्रदेश के सरकारी चिकित्सा महाविद्यालयों के साथ एक सहयोगात्मक नेटवर्क विकसित करना है। इसके अंतर्गत साझा विशेषज्ञता, मानकीकृत प्रोटोकॉल, नमूनों की रेफरल व्यवस्था, अकादमिक सहयोग एवं प्रशिक्षण के माध्यम से प्रिसीजन मेडिसिन की

सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा। इससे मौजूदा स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रभावी उपयोग करते हुए प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में उन्नत चिकित्सा तकनीकों की पहुँच बढ़ाई जा सकेगी। इसका उदेश्य “सही मरीज़ को, सही दवा, सही खुराक में, सही समय पर के तहत कार्य किया जायेगा.

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