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मनुष्य के जीवन में दुःखों का सबसे बड़ा कारण अहंकार – मुक्तिनाथानन्द 

मनुष्य का जन्म ईश्वर प्राप्ति के लिए हुआ

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। मनुष्य के जीवन में दुःखों का सबसे बड़ा कारण अहंका बताया गया।

शनिवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण परमहंस का संपूर्ण जीवन मानवता को ईश्वर की ओर अग्रसर करने और आत्मिक शांति का मार्ग दिखाने के लिए समर्पित था।

उनकी शिक्षाओं का मुख्य आधार प्रेम, भक्ति, सरलता और अहंकार का त्याग था। 23 अक्टूबर 1885 को भक्तों के साथ हुई एक चर्चा में उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि मनुष्य के जीवन में दुःखों का सबसे बड़ा कारण अहंकार है।

जब तक मनुष्य अपने भीतर “मैं” और “मेरा” की भावना को बनाए रखता है, तब तक वह ईश्वर के वास्तविक स्वरूप का अनुभव नहीं कर सकता। स्वामी ने बताया ठाकुर कहते हैं कि भगवान हमारे सबसे निकट हैं, किंतु हमारे और उनके बीच अहंकार की एक अदृश्य दीवार खड़ी रहती है।

मनुष्य स्वयं को सब कुछ मान बैठता है और यही भावना उसे ईश्वर से दूर कर देती है। जब तक व्यक्ति अपने अहंकार का त्याग नहीं करता, तब तक उसके जीवन के दुःख समाप्त नहीं होते।

इसलिए आध्यात्मिक जीवन का पहला कदम अपने “मैं” को छोटा करना और ईश्वर को सर्वोपरि मानना है। इस सत्य को समझाने के लिए रामकृष्ण परमहंस ने गाय का एक अत्यंत सुंदर उदाहरण दिया।

गाय बार-बार “हम्बा-हम्बा” अर्थात “मैं-मैं” करती है और जीवनभर अनेक कष्ट सहती है। परंतु जब उसका अहंकार समाप्त हो जाता है, तब वही “तू-तू” की स्थिति को प्राप्त करती है।

इसका अर्थ है कि जब मनुष्य अपने “मैं” को छोड़कर यह अनुभव करता है कि “सब कुछ तुम ही हो, हे प्रभु”, तभी उसे वास्तविक मुक्ति प्राप्त होती है। यही शिक्षा हमें भी अपने जीवन में अपनानी चाहिए कि “ना हम, ना हम, तू ही तू।”

स्वामी ने समझाया कि रामकृष्ण यह भी स्वीकार करते हैं कि अहंकार को पूरी तरह समाप्त करना आसान नहीं है। इसलिए वे इसका एक व्यावहारिक उपाय बताते हैं। वे कहते हैं कि यदि अहंकार रहे भी, तो उसे ईश्वर की ओर मोड़ देना चाहिए।

मनुष्य यह भावना रखे कि “मैं ईश्वर का सेवक हूं”, “मैं ईश्वर की संतान हूं” या “मैं उनका दास हूं।” ऐसा अहंकार मनुष्य को बंधन में नहीं डालता, बल्कि उसे विनम्र, भक्तिमय और सदाचारी बनाता है। इस प्रकार अहंकार भी ईश्वर की भक्ति का साधन बन सकता है।

आज के समय में मनुष्य धन, पद, प्रतिष्ठा और सफलता के कारण स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है। यही अहंकार परिवारों में कलह, समाज में संघर्ष और व्यक्ति के मन में अशांति उत्पन्न करता है।

यदि हम रामकृष्ण की शिक्षाओं का पालन करते हुए विनम्रता, सेवा और प्रेम का मार्ग अपनाएँ, तो हमारा जीवन अधिक शांत, सुखी और आनंदमय बन सकता है। दूसरों का सम्मान करना, ईश्वर का स्मरण करना और स्वयं को उनका सेवक मानना अहंकार को कम करने के प्रभावी उपाय हैं।

स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण परमहंस का संदेश यही है कि मनुष्य का जन्म केवल सांसारिक सुख-सुविधाओं के लिए नहीं, बल्कि ईश्वर की प्राप्ति और आत्मिक आनंद के लिए हुआ है।

जब हम अपने अहंकार को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देते हैं, तब हमारे जीवन में सच्ची शांति, आनंद और मुक्ति का उदय होता है।

इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को “मैं” की भावना छोड़कर “तू ही तू” का भाव अपनाना चाहिए। यही जीवन की सफलता, आध्यात्मिक उन्नति और वास्तविक आनंद का सबसे सरल तथा श्रेष्ठ मार्ग है।

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