शास्त्रों का अध्ययन मनुष्य को सत्य की ओर ले जाने का साधन – मुक्तिनाथानन्द
ज्ञान को अनुभव में बदलना अधिक आवश्यक

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। शास्त्रों का अध्ययन मनुष्य को सत्य की ओर ले जाने का साधन बताया गया। मंगलवार को
प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि मानव जीवन का परम उद्देश्य केवल ईश्वर के विषय में जानना नहीं, बल्कि ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव करना है।
शास्त्रों का अध्ययन, आध्यात्मिक ग्रंथों का ज्ञान और दार्शनिक चिंतन मनुष्य को सत्य की ओर ले जाने वाले महत्वपूर्ण साधन हैं, लेकिन केवल बौद्धिक ज्ञान से ईश्वर की अनुभूति नहीं हो सकती।
रामकृष्ण परमहंस के जीवन और उपदेशों में इसी सत्य पर विशेष बल मिलता है कि ईश्वर को केवल जानना नहीं, बल्कि उन्हें देखना और अनुभव करना चाहिए। स्वामी ने बताया कि इस संदर्भ में महिमाचरण चक्रवर्ती का उदाहरण अत्यंत शिक्षाप्रद है।
वे अत्यंत विद्वान व्यक्ति थे। उन्हें अंग्रेज़ी और संस्कृत का गहरा ज्ञान था तथा उनके पास पुस्तकों का विशाल संग्रह भी था। वे शास्त्रों और धर्म के विषय में बहुत कुछ जानते थे। फिर भी रामकृष्ण उन्हें बार-बार यह समझाते थे कि ईश्वर के बारे में जानना और ईश्वर को जानना, इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।
पुस्तकों में ईश्वर के बारे में पढ़ा जा सकता है, उनके गुणों और स्वरूप पर चर्चा की जा सकती है। लेकिन यह सब तब तक अधूरा है जब तक साधक स्वयं उस दिव्य सत्य का अनुभव न कर ले। ज्ञान के साथ अहंकार जुड़ जाए तो वही ज्ञान आध्यात्मिक उन्नति में बाधा बन सकता है।
मनुष्य जब अपनी विद्वत्ता, प्रतिष्ठा, संपत्ति या धार्मिक ज्ञान पर गर्व करने लगता है, तब उसके भीतर ‘मैं’ की भावना मजबूत होती जाती है। यही अहंकार ईश्वर और मनुष्य के बीच एक दीवार खड़ी कर देता है।
इसलिए आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य केवल अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि अहंकार का क्षय करना भी है। स्वामी ने कहा कि रामकृष्ण मानव अहंकार की इस कमजोरी को सरल उदाहरणों द्वारा समझाते थे।
मनुष्य कभी स्वयं को किसी दूसरे व्यक्ति का उद्धारकर्ता समझता है और कभी किसी वस्तु या संपत्ति का पूर्ण स्वामी। वास्तव में जीवन, शक्ति, संपत्ति और परिस्थितियाँ सब परिवर्तनशील हैं।
मनुष्य केवल अपने सीमित अधिकार और कर्तव्य का साधन है। ईश्वर की दृष्टि से ‘मैं ही सब कुछ करता हूँ’ का भाव अज्ञान का लक्षण है। जब मनुष्य अपने कर्तापन के अहंकार को छोड़कर ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करता है, तभी उसके भीतर विनम्रता और आध्यात्मिक जागृति का जन्म होता है।
आध्यात्मिक साधना में शास्त्रों का अध्ययन, वेदांत का चिंतन, जप, ध्यान, प्रार्थना और भक्ति का बहुत महत्व है। लेकिन इन सभी साधनों का अंतिम लक्ष्य ईश्वर-साक्षात्कार होना चाहिए।
यदि अध्ययन से अहंकार बढ़ता है और साधना से मन में विनम्रता, प्रेम तथा ईश्वर के प्रति तड़प उत्पन्न नहीं होती, तो साधना अपने वास्तविक उद्देश्य से दूर हो जाती है।
स्वामी ने समझाया कि ईश्वर मन और बुद्धि की सीमाओं से परे हैं। अलग-अलग मनुष्य अपनी मानसिक अवस्था और आध्यात्मिक पात्रता के अनुसार ईश्वर को अलग-अलग रूपों में अनुभव कर सकते हैं।
इसलिए केवल तर्क और विचार के आधार पर ईश्वर को पूरी तरह समझ लेना संभव नहीं है। प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अनुभव ही उस सत्य को जीवंत बनाता है। जिसके बारे में शास्त्र बताते हैं। अतः जीवन में ज्ञान आवश्यक है, लेकिन ज्ञान को अनुभव में बदलना उससे भी अधिक आवश्यक है।
शास्त्र हमारे लिए मार्गदर्शक हैं, गुरु दिशा दिखाते हैं और साधना हमें उस मार्ग पर आगे बढ़ाती है। *जब अहंकार की दीवार टूटती है, तब साधक के सामने ईश्वर की अनुभूति का द्वार खुलता है।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि वास्तविक आध्यात्मिक जीवन का संदेश यही ईश्वर के बारे में केवल जानो मत, उन्हें जानने के लिए साधना करो और अंततः उनका प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करने का प्रयास करो। यही ज्ञान की पूर्णता और मानव जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।



