मानव शरीर की तुलना वीणा से करते- मुक्तिनाथानन्द
स्वास्थ्य की कामना ईश्वर सेवा के लिए होनी चाहिए

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। शारीरिक क्रिया भेद का जिक्र देकर समझाया गया।
शुक्रवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने बताया कि रामकृष्ण परमहंस के आध्यात्मिक विचारों में मानव शरीर, मन और आत्मा के संबंध का विशेष महत्व है।
उनके अनुसार शरीर केवल भौतिक अस्तित्व नहीं है, बल्कि यह उस आत्मिक चेतना का माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य ईश्वर की ओर बढ़ सकता है। 23 अक्टूबर 1885 को भक्त गिरिशचंद्र घोष और चिकित्सक डॉ. महेंद्रलाल सरकार के साथ हुई बातचीत में रामकृष्ण ने शरीर और आत्मा के संबंध पर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए थे।
इन विचारों में शरीर की उपयोगिता, स्वास्थ्य का उद्देश्य, देह से वैराग्य और प्रार्थना की भूमिका प्रमुख रूप से सामने आती है।
स्वामी ने बताया कि रामकृष्ण मानव शरीर की तुलना वीणा से करते हैं। जिस प्रकार वीणा के तार ठीक प्रकार से जुड़े और संतुलित हों तभी उससे मधुर संगीत निकल सकता है, उसी प्रकार शरीर स्वस्थ और संतुलित हो तो मनुष्य अपनी आध्यात्मिक साधना अच्छी तरह कर सकता है।
शरीर को स्वस्थ रखना केवल सुख-सुविधा या भौतिक आनंद के लिए नहीं होना चाहिए। शरीर को एक ऐसे साधन के रूप में देखना चाहिए जिसके माध्यम से मनुष्य ईश्वर का स्मरण, भक्ति, जप और सेवा कर सके। इस दृष्टि से स्वास्थ्य स्वयं अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ उद्देश्य की पूर्ति का साधन है।
स्वामी ने कहा कि श्रीरामकृष्ण स्वास्थ्य के प्रति इसी आध्यात्मिक दृष्टिकोण को सामने रखते हैं। उनके अनुसार शरीर की देखभाल इसलिए आवश्यक है कि मनुष्य ईश्वर की सेवा और आध्यात्मिक साधना में सक्षम बना रहे।
यदि शरीर अत्यधिक दुर्बल या अस्वस्थ हो जाए, तो साधना और सेवा में बाधा उत्पन्न हो सकती है। इसलिए शरीर की आवश्यकताओं की उपेक्षा करना उचित नहीं है, लेकिन शरीर को ही जीवन का अंतिम सत्य मान लेना भी उचित नहीं है।
यहीं से देह-बुद्धि से ऊपर उठने का विचार सामने आता है। देह-बुद्धि का अर्थ है स्वयं को केवल शरीर मान लेना। रामकृष्ण के अनुसार जब मनुष्य सांसारिक इच्छाओं और आसक्तियों से मुक्त होने लगता है, तब उसे अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होने लगता है।
उन्होंने सांसारिक आकर्षणों को कामिनी-कांचन के प्रतीक के रूप में समझाया। जब मन इन आसक्तियों से धीरे-धीरे मुक्त होता है, तब आत्मा और शरीर के बीच का अंतर अधिक स्पष्ट अनुभव होने लगता है।
उन्होंने इसकी तुलना नारियल के भीतर से गिरी के खोल से अलग होने से की है। यह उपमा बताती है कि आत्मिक जागरूकता बढ़ने पर मनुष्य शरीर से जुड़ी सीमाओं को ही अपना संपूर्ण अस्तित्व नहीं मानता।
स्वामी ने समझाया कि इस संदर्भ में प्रार्थना का भी विशेष महत्व है। रामकृष्ण ने अपने बीमारी के अनुभव को याद करते हुए बताया कि उन्होंने माँ काली से केवल शरीर के सुख के लिए प्रार्थना नहीं की, बल्कि शरीर को इतना स्वस्थ रखने की प्रार्थना की कि वे अपना आध्यात्मिक कार्य जारी रख सकें।
यह दृष्टिकोण प्रार्थना के उद्देश्य को एक नया अर्थ देता है। स्वास्थ्य की कामना व्यक्तिगत भोग के लिए नहीं, बल्कि ईश्वर-सेवा और लोककल्याण के लिए हो सकती है। स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण की शिक्षाएँ शरीर और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा देती हैं।
शरीर की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वह साधना का माध्यम है। शरीर के प्रति अत्यधिक आसक्ति भी उचित नहीं है।
स्वस्थ शरीर, संयमित मन, सांसारिक आसक्तियों से वैराग्य और ईश्वर के प्रति समर्पण इन सबके समन्वय से मनुष्य अपने जीवन को अधिक सार्थक बना सकता है। यही श्रीरामकृष्ण की दृष्टि में शरीर की वास्तविक उपयोगिता और मानव जीवन की आध्यात्मिक दिशा है।



