वैज्ञानिकों ने कृत्रिम जीवित हार्ट वाल्व बनाने की दिशा में बढ़ाया कदम
एसजीपीजीआईएमएस के वैज्ञानिकों का ऐतिहासिक कदम, संस्थान निदेशक ने दी बधाई

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान नित नई बुलंदियों को हासिल करने में लगा हुआ है।
सोमवार संस्थान के वैज्ञानिकों ने मानव हृदय वाल्व की वाल्व इंटरस्टिशियल कोशिकाओं को सफलतापूर्वक पृथक कर उनका प्रयोगशाला कल्चर विकसित करने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है।
ज्ञात हो कि यह उपलब्धि भविष्य में टिश्यू-इंजीनियर्ड जीवित मानव हृदय वाल्व विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। ऐसे वाल्व भविष्य में उन रोगियों के लिए उपयोगी हो सकते हैं जिन्हें हृदय वाल्व प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है।
वाल्व इंटरस्टिशियल कोशिकाएँ हृदय वाल्व की संरचना, मजबूती तथा क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। शोधकर्ताओं ने इन कोशिकाओं को प्रयोगशाला में सक्रिय बनाए रखने के साथ-साथ उनके मेटाबोलिज्म में परिवर्तन कर उनके व्यवहार और कार्यप्रणाली का भी अध्ययन किया।
इससे भविष्य में रोगग्रस्त वाल्व की मरम्मत और पुनर्निर्माण के नए रास्ते खुल सकते हैं। इस अध्ययन को भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग, नई दिल्ली का वित्तीय सहयोग प्राप्त हुआ।
शोध के परिणामों को स्प्रिंगर नेचर द्वारा प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय, समकक्ष-समीक्षित शोध पत्रिका जर्नल ऑफ फिजियोलॉजी एंड बायोकेमिस्ट्री में प्रकाशन के लिए स्वीकार कर लिया गया है।
साथ ही, इस अध्ययन को “इंटरस्टिशियल डिज़ीज़” विषयक प्रभावशाली अनुसंधानों की श्रेणी में भी स्थान प्रदान किया गया है। वहीं
इस अध्ययन का नेतृत्व कार्डियोवैस्कुलर एवं थोरेसिक सर्जरी विभाग के डॉ. शांतनु पांडे तथा मॉलिक्यूलर मेडिसिन एवं बायोटेक्नोलॉजी विभाग के डॉ. आलोक कुमार ने किया।
शोध के दौरान वाल्व प्रत्यारोपण सर्जरी से गुजर रहे रोगियों से प्राप्त हृदय वाल्व ऊतकों का उपयोग कर प्राथमिक मानव रूमैटिक वाल्व इंटरस्टिशियल कोशिका कल्चर सफलतापूर्वक स्थापित किया गया।
यह मॉडल वैज्ञानिकों को यह समझने में सहायता करेगा कि रूमैटिक हृदय रोग किस प्रकार धीरे-धीरे हृदय वाल्व को क्षति पहुँचाता है तथा नई उपचार पद्धतियों की प्रभावशीलता का परीक्षण कैसे किया जा सकता है।
अध्ययन में वैज्ञानिकों ने दो महत्वपूर्ण जैविक सिग्नलिंग मार्ग—TGF-β/SMAD3 और ERK1/2—की पहचान की, जो हृदय वाल्व में सूजन तथा फाइब्रोसिस (ऊतक में स्थायी दाग बनने की प्रक्रिया) को बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
इस शोध से यह स्पष्ट हुआ कि रूमैटिक हृदय रोग केवल वाल्व की संरचनात्मक खराबी नहीं है, बल्कि यह लगातार बनी रहने वाली सूजन और फाइब्रोसिस से संचालित एक सक्रिय जैविक प्रक्रिया है।
यह अध्ययन भविष्य में ऐसी लक्षित उपचार पद्धतियों के विकास का मार्ग प्रशस्त करता है, जो वाल्व में होने वाली फाइब्रोसिस को रोक या धीमा कर सकें, वाल्व की सामान्य कार्यक्षमता को लंबे समय तक बनाए रखें तथा कई रोगियों में वाल्व प्रत्यारोपण की आवश्यकता को कम या विलंबित कर सकें।
इसके अतिरिक्त, विकसित किया गया यह मानव वाल्व कोशिका मॉडल रोग की कार्यप्रणाली को समझने, नए बायोमार्कर खोजने और नई दवाओं के मूल्यांकन के लिए भी एक महत्वपूर्ण अनुसंधान मंच प्रदान करेगा।
यह शोध कार्डियोवैस्कुलर एवं थोरेसिक सर्जरी विभाग, मॉलिक्यूलर मेडिसिन एवं बायोटेक्नोलॉजी विभाग तथा क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग के संयुक्त प्रयासों से सम्पन्न हुआ।
अध्ययन में चरण साई रामिरेड्डी एवं अंजलि सिंह (मॉलिक्यूलर मेडिसिन एवं बायोटेक्नोलॉजी विभाग), मोहित के. राय एवं विकास अग्रवाल (क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग) तथा सुरेन्द्र के. अग्रवाल (कार्डियोवैस्कुलर एवं थोरेसिक सर्जरी विभाग) ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
परियोजना के आगामी चरणों को और अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए पैथोलॉजी विभाग की डॉ. विनीता अग्रवाल भी शोध दल से जुड़ी हैं। वे ऊतक-रोग विज्ञान (हिस्टोपैथोलॉजी) के विश्लेषण में अपनी विशेषज्ञता प्रदान कर रही हैं। जिससे इस शोध की नैदानिक एवं ट्रांसलेशनल उपयोगिता को और अधिक मजबूती मिलेगी।
इसी क्रम में संस्थान निदेशक प्रो. आरके धीमन टीम को बधाई देते हुए कहा, “यह उपलब्धि बायोमेडिकल रिसर्च, इनोवेशन और ट्रांसलेशनल मेडिसिन के क्षेत्र में बेहतरीन काम करने के प्रति संस्थान की अटूट प्रतिबद्धता को दिखाती है। मैं रिसर्च टीम को उनके समर्पण और वैज्ञानिक उत्कृष्टता के लिए बधाई देता हूँ।



