संबंधों के आधार पर निर्णय लेने से विवेक पड़ जाता धुंधला – मुक्तिनाथानन्द
मोह नहीं, विवेक है जीवन का मार्गदर्शक

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। जीवन का मार्ग प्रशस्त करने के लिए प्रेम और कर्तव्य का बोध कराया गया। शुक्रवार को
श्रीमद्भगवद्गीता पर अपने साप्ताहिक प्रवचन में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के
श्लोक 33, 34 एवं 35 मानव जीवन में कर्तव्य और मोह के बीच उत्पन्न होने वाले संघर्ष को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने बताया कि कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में अर्जुन की मानसिक अवस्था केवल एक योद्धा की दुविधा नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के अंतर्मन में चलने वाले संघर्ष का प्रतीक है।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहते हैं कि जिन लोगों के लिए राज्य, सुख और भोग की कामना की जाती है, वही गुरुजन, माता-पिता, पुत्र,
पितामह और अन्य संबंधी युद्धभूमि में खड़े हैं। ऐसे में विजय और राज्य प्राप्ति का क्या अर्थ रह जाता है। अर्जुन की यह भावना उनके हृदय की करुणा और पारिवारिक प्रेम को दर्शाती है।
अर्जुन का यह दृष्टिकोण मानवीय संवेदना से परिपूर्ण है, किंतु इसके पीछे मोह का तत्व भी छिपा हुआ है। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य केवल संबंधों के आधार पर निर्णय लेने लगता है, तब उसका विवेक धुंधला पड़ सकता है।
यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण आगे चलकर अर्जुन को आत्मज्ञान, निष्काम कर्म और धर्म के सिद्धांतों का उपदेश देते हैं।
इन श्लोकों का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना महाभारत काल में था। आधुनिक जीवन में भी व्यक्ति अनेक बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करता है, जहाँ भावनाएँ और कर्तव्य परस्पर टकराते हैं।
परिवार, समाज, संस्था अथवा राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व निभाने के समय मनुष्य को संतुलित दृष्टि अपनानी होती है। केवल भावनात्मक दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं होता; निर्णय धर्म, न्याय और व्यापक हित को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए।
श्रीमद्भगवद्गीता हमें संवेदनहीन बनने की शिक्षा नहीं देती, बल्कि करुणा और विवेक के समन्वय का मार्ग दिखाती है।
अर्जुन की करुणा प्रशंसनीय है, परंतु यदि करुणा कर्तव्य से विमुख कर दे तो वह मोह का रूप ले सकती है। इसलिए जीवन में ऐसी दृष्टि विकसित करनी चाहिए जो प्रेम और कर्तव्य दोनों का संतुलन बनाए रखे।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि गीता के ये श्लोक हमें यह समझाते हैं कि भौतिक उपलब्धियों का वास्तविक महत्व तभी है, जब वे धर्म, नैतिकता और मानव कल्याण से जुड़ी हों।
मनुष्य को अपने निर्णयों में आत्मिक दृष्टि, विवेक और कर्तव्यबोध को स्थान देना चाहिए। यही गीता का शाश्वत संदेश है और यही अर्जुन-विषाद से प्राप्त होने वाली महत्वपूर्ण शिक्षा भी है।



