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मनुष्य को मोह, भय चिंता से मानसिक शक्ति होती कमजोर -मुक्तिनाथानन्द 

कठिन समय में ईश्वर पर बनाये विश्वास

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। कठिन परिस्थिति में ईश्वर के अटूट विश्वास बनाये रखने का मार्ग दिखाया। शुक्रवार को

श्रीमद्भगवद्गीता पर अपने साप्ताहिक प्रवचन में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय की व्याख्या करते हुए बताया कि अर्जुन की मानसिक अवस्था और उसके भीतर चल रहे गहरे संघर्ष को प्रकट करता है।

अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं कि “हे केशव! मैं अब खड़ा रहने में भी समर्थ नहीं हूँ, मेरा मन चक्कर खा रहा है और मुझे सब ओर अशुभ संकेत दिखाई दे रहे हैं।

यह केवल एक योद्धा की कमजोरी नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण है। महाभारत के युद्धभूमि में अर्जुन अपने ही गुरुजनों, बंधु-बांधवों और मित्रों को सामने खड़ा देखकर मोह और करुणा से भर उठते हैं।

उनका मन धर्म और संबंधों के बीच उलझ जाता है। एक ओर क्षत्रिय धर्म उन्हें युद्ध के लिए प्रेरित करता है, तो दूसरी ओर परिवार और समाज के प्रति प्रेम उन्हें रोकता है। इसी द्वंद्व के कारण उनका मन विचलित हो जाता है। इस श्लोक में अर्जुन की यही मानसिक पीड़ा व्यक्त हुई है।

स्वामी ने कहा कि तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य अत्यधिक मोह, भय या चिंता में पड़ जाता है, तब उसकी मानसिक शक्ति कमजोर हो जाती है।

वह सही निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता है और उसे हर दिशा में नकारात्मकता दिखाई देने लगती है। अर्जुन जैसा महान योद्धा भी उस समय अपने आत्मविश्वास को खो बैठता है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि मानसिक संतुलन जीवन में अत्यंत आवश्यक है।

यह आज के जीवन में भी बहुत प्रासंगिक है। आधुनिक जीवन में विद्यार्थी परीक्षा के समय, व्यापारी आर्थिक संकट में, या सामान्य व्यक्ति पारिवारिक समस्याओं में इसी प्रकार की मानसिक उलझन अनुभव करता है।

जब परिस्थितियाँ कठिन हो जाती हैं, तब मन भ्रमित हो जाता है और व्यक्ति को सब कुछ विपरीत दिखाई देने लगता है। ऐसे समय में धैर्य, आत्मविश्वास और सही मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।

स्वामी ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण आगे चलकर अर्जुन को ज्ञान, कर्म और भक्ति का उपदेश देकर उनकी इस मानसिक कमजोरी को दूर करते हैं। इससे यह संदेश मिलता है कि जीवन की कठिन परिस्थितियों में केवल भावनाओं में बह जाना उचित नहीं है, बल्कि विवेक और आत्मज्ञान के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।

निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने समझाया कि मानव मन की कमजोरी और उसके समाधान दोनों की ओर संकेत करता है। यह हमें सिखाता है कि कठिन समय में घबराने के बजाय अपने कर्तव्य, आत्मबल और ईश्वर पर विश्वास बनाए रखना चाहिए। तभी मनुष्य जीवन की चुनौतियों का सामना सफलतापूर्वक कर सकता है।

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