बिना पैथालॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट चल रहा टीबी अस्पताल
वर्षो से रेडियोलॉजिस्ट का पद खाली, घर के समीप कैसे मिलेगी मरीजों को स्वास्थ्य सुविधा

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। राजधानी में दीपक तले अंधेरा वाला मुहावरा सरकारी अस्पतालों पर फिट बैठ रहा है।
जहाँ प्रदेश सरकार मरीजों को हर संभव चिकित्सा सुविधा प्रदान करने के लिए मेडिकल कॉलेज स्थापित करने पर अमादा है। जिसमें मेडिकल कॉलेज को छोड़कर राजधानी के ठाकुरगंज स्थित संयुक्त चिकित्सालय की बात करें तो बगैर रेडियोलॉजिस्ट और पैथालॉजिस्ट मरीजों की जाँच रिपोर्ट जिला अस्पताल बलरामपुर पर निर्भर है।
जबकि यह अस्पताल वर्षो से रेडियोलॉजिस्ट और पैथालॉजिस्ट बगैर चल रहा है। देखा जाये तो यह अस्पताल सबसे घनी आबादी वाले पुराने शहर क्षेत्र में स्थित है। यह अस्पताल मरीजों का भारी भरकम बोझ लेकर चल रहा है।
सूत्रों की माने तो इस संयुक्त चिकित्सालय में 2018 से रेडियोलॉजिस्ट और 2022 से पैथालॉजिस्ट नहीं है। जबकि बायो केमिकल एग्जामिनेशन इंचार्ज डॉ. सुमन वरुण को बनाया गया है।
वह सिर्फ स्टॉफ की ड्यूटी और देखरेख ही कर सकती है वह न तो जाँच रिपोर्ट जारी कर सकती हैं और न ही उसपर कोई प्रश्न उठा सकती है।
सूत्रों की माने तो संयुक्त चिकित्सालय की पैथालॉजी का जाँच रिकार्ड देखा जाय तो महीने भर में लगभग 60 हज़ार जाँच और प्रतिदिन का 2हज़ार जाँच रिपोर्ट का रिकार्ड मिलता है और प्रतिदिन की ओपीडी की बात की जाए तो लगभग एक हज़ार से लगाकर 12 सौ से अधिक अस्पताल में मरीजों का इलाज के लिए आना होता है।
वहीं जब सूत्रों से अस्पताल में डॉक्टरों के पदों की जानकारी ली तो वह चौकाने वाला रिकॉर्ड मिला। जिसमें अस्पताल में डॉक्टरों के लगभग 40 पद भरे जाने हैं. जिसमें सिर्फ 21डॉक्टर ही अस्पताल को संभाल रहें है। जिसमें अस्पताल में लाखों की लागत से बनाई गयी ओटी धूल चाट रही है, सर्जन की कमी के चलते ऑपरेशन ठप चल रहें हैं।
जिससे बड़े अस्पतालों पर बोझ बढ़ने का यह भी सबसे बड़ा कारण साबित हो रहा है। जहाँ सिर्फ इएनटी और अर्थोपेडिक सर्जरी होना संभव हो पा रहा है। बल्कि अन्य सर्जरी पूरी तरह से ठप होने का सबसे बड़ा कारण सर्जन नहीं है। इसके पहले 2022 में सर्जन डॉ. श्रीवास्तव के ट्रांसफर हो जाने के बाद अभी भी उस खाली पद को शासन प्रशासन नहीं भर सका है।
वहीं मरीजों की जाँच रिपोर्ट के लिए पैथालॉजिस्ट और रेडियोलॉजिस्ट की कमी के चलते दूसरे अस्पताल पर बोझ डाल कर अस्पताल चलाया जा रहा है। ऐसे में जब संयुक्त चिकित्सा लय में समस्त सुविधा नहीं मिलेगी तो बड़े अस्पतालों पर बोझ बढ़ना लाज़मी है। वहीं जब मरीज बड़े चिकित्सा संस्थान की तरफ जाने का रुख करता है तो उसे बेड फुल होने का हवाला देकर वापस कर दिया जाता है।
अभी हाल ही कई नामी गिरामी चिकित्सा संस्थान में देखा भी गया है। जहाँ बेड फुल होने के चलते मरीजों को इधर से उधर भेजनें का खेल चलता है। इस हालात में आखिर मरीज के परिजन असहाय और निराश होकर बैठ जाते हैं।
वहीं घरों के समीप बने अस्पतालों में व्यवस्था पूरी हो जाए तो मरीजों को इलाज के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। जबकि शहर के सरकारी अस्पतालों में यह हाल है तो ग्रामीण स्तर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों का हाल कैसा होगा। इससे अस्पतालों की व्यवस्था का आंकलन किया व समझा जा सकता है।
अस्पताल में मरीजों को किसी तरह की असुविधा नहीं होने दी जाती है। रही बात पैथालॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट और डॉक्टर की कमी की, इसके लिए विभाग से मांग की जा चुकी है।
डॉ. एसपी सिंह
मुख्य चिकित्सा अधीक्षक
संयुक्त चिकित्सालय ठाकुरगंज लखनऊ



