उत्तर प्रदेशधर्म-अध्यात्म

प्रेम ही सभी धर्मों का मूल तत्व – मुक्तिनाथानन्द

रामकृष्ण देव 190वीं जयंती समारोह

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। रामकृष्ण मठ में जयंती मनाई गयी। शनिवार को रामकृष्ण देव की 190वीं जयंती समारोह हर्षोल्लास के साथ रामकृष्ण मठ में मनाई जा रही है।

साथ समस्त कार्यक्रम यूट्यूब चैनेल : ‘रामकृष्ण मठ लखनऊ’ के माध्यम से सीधा प्रसारित किया जा रहा है।

मठ मंदिर परिसर में सुबह 5 बजे शंखनाद व मगंल आरती के बाद प्रातः 6: 50 बजे वैदिक मंत्रोच्चारण रामकृष्ण मठ के स्वामी इष्टकृपानन्द द्वारा शुभारम्भ किया गया। वहीं मठ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज द्वारा सत् प्रसंग दिया तथा प्रातः 10 बजे से मनमोहक भक्तिगीत अशोक मुखर्जी, कानपुर द्वारा प्रस्तुति दी गयी।

वहीं शुभम राज ने तबले पर एवं खोल पर गोपाल भट्टाचार्य ने संगत किया। इन भक्ति गीतों की प्रस्तुति दी।

इसी क्रम में प्रातः 11ः30 बजे से मठ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद के नेतृत्व में दरिद्र नारायण सेवा का आयोजन किया गया। जिसमें लखनऊ के विभिन्न भाग से आये हुये सैकड़ो दरिद्र नारायणों की परितोष पूर्वक भोजन कराते हुए रामकृष्ण के वाणी ‘‘शिव ज्ञान से जीव सेवा’’ आक्षरिक अर्थ में पारित हुआ।

सायंकाल भगवान श्री रामकृष्ण की संध्या आरती के पश्चात मठ प्रेक्षागृह में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसका शुभारम्भ अशोक मुखर्जी द्वारा गाये गये भक्तिमय उद्घाटन गीत से हुआ। जिस पर तबले पर संगत शुभम राज लखनऊ द्वारा किया गया।

उसके पश्चात रामकृष्ण मठ लखनऊ के स्वामी विश्वदेवानंद ने भगवान श्रीरामचन्द्र ही श्रीरामकृष्ण के रूप ‘ विषय पर अपना प्रवचन प्रस्तुत किया। तत्पश्चात रामकृष्ण मिशन होम ऑफ सर्विस, वाराणसी से पधारे स्वामी ईशानन्द ने ‘‘भवान रामचन्द्र ही श्री रामकृष्ण के रूप में आये थे’’ विषय पर अपने विचार व्यक्त किये।

उन्होंने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब ईश्वर विभिन्न रूपों में अवतार लेकर पृथ्वी पर प्रकट होते हैं। इसी संदर्भ में कुछ भक्तों और संतों का यह विश्वास है कि भगवान रामचन्द्र ने ही आधुनिक युग में श्री रामकृष्ण परमहंस के रूप में अवतार लिया। जिन्होंने भक्ति, प्रेम और ईश्वर-प्राप्ति के सरल मार्ग का प्रचार किया।

उन्होंने विभिन्न धर्मों का अभ्यास कर यह सिद्ध किया कि सभी धर्म अंततः एक ही परम सत्य की ओर ले जाते हैं।

उन्होंने कहा कि दोनों के जीवन में करुणा, धर्मनिष्ठा और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण की समानता दिखाई देती है। जिस प्रकार रामचन्द्र ने त्रेता युग में धर्म की स्थापना की, उसी प्रकार श्री रामकृष्ण ने आधुनिक युग में आध्यात्मिक चेतना को पुनर्जीवित किया।

उनका जीवन यह संदेश देता है कि ईश्वर विभिन्न कालों में विभिन्न रूपों में प्रकट होकर मानवता का मार्गदर्शन करते हैं। मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज ने ‘‘ईसामसीह एवं चैतन्य देव के अवतार श्री रामकृष्ण’’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में यह विश्वास किया जाता है कि ईश्वर समय-समय पर विभिन्न रूपों में अवतार लेकर मानवता का मार्गदर्शन करते हैं।

श्री रामकृष्ण परमहंस में ईसा मसीह तथा चैतन्य महाप्रभु की दिव्य चेतना का समन्वय दिखाई देता है। ईसा मसीह प्रेम, क्षमा और त्याग के प्रतीक माने जाते हैं। उन्होंने मानवता को करुणा, दया और परमेश्वर के प्रति अटूट विश्वास का संदेश दिया। दूसरी ओर, चैतन्य महाप्रभु ने प्रेम-भक्ति और हरिनाम संकीर्तन के माध्यम से ईश्वर-प्राप्ति का सरल मार्ग बताया।

श्री रामकृष्ण का जीवन इन दोनों धाराओं के अद्भुत संगम के रूप में देखा जाता है। उन्होंने न केवल हिन्दू साधना-पद्धतियों का अभ्यास किया, बल्कि ईसाई और इस्लामी साधना का भी अनुभव किया।

उनकी शिक्षाएँ प्रेम, सहिष्णुता और सभी धर्मों की एकता पर आधारित है। श्री रामकृष्ण को विभिन्न धार्मिक परंपराओं की दिव्य चेतना का जीवंत समन्वय मानते हैं। जिससे यह संदेश मिलता है कि सत्य एक है, मार्ग अनेक हैं, और प्रेम ही सभी धर्मों का मूल तत्व है।

नवंबर 1874 में, श्री रामकृष्ण को ईसाई धर्म की सच्चाई जानने की ज़बरदस्त इच्छा हुई। उन्होंने कलकत्ता के एक सज्जन और गुरु के भक्त शंभू चरण मल्लिक से बाइबिल के पाठ सुनना शुरू किया। श्री रामकृष्ण यीशु के जीवन और शिक्षाओं से बहुत प्रभावित हुए।

एक दिन वे दक्षिणेश्वर में जादू मल्लिक के गार्डन हाउस के पार्लर में बैठे थे, तभी उनकी नज़र मैडोना और बच्चे की एक पेंटिंग पर पड़ी। उसे ध्यान से देखते हुए, वे धीरे-धीरे दिव्य भावना से भर गए। तस्वीर में दिख रहे लोगों में जान आ गई, और उनसे निकलने वाली रोशनी की किरणें उनकी आत्मा में समा गईं।

इस अनुभव का असर मोहम्मद के दर्शन से भी ज़्यादा था। वे परेशान होकर चिल्लाए, “हे माँ! आप मेरे साथ क्या कर रही हैं?“ और, पंथ और धर्म की रुकावटों को तोड़कर, वह परमानंद की एक नई दुनिया में पहुँच गए। ईसा मसीह ने उनकी आत्मा पर कब्ज़ा कर लिया। तीन दिनों तक उन्होंने काली मंदिर में कदम नहीं रखा।

चौथे दिन, दोपहर में, जब वह पंचवटी में टहल रहे थे, तो उन्होंने अपनी ओर एक सुंदर बड़ी आँखों, शांत चेहरे और गोरी त्वचा वाले व्यक्ति को आते देखा। जैसे ही दोनों एक-दूसरे के सामने आए, श्री रामकृष्ण की आत्मा की गहराई में एक आवाज़ गूंजीः “देखो ईसा मसीह, जिन्होंने दुनिया की मुक्ति के लिए अपने दिल का खून बहाया, जिन्होंने इंसानों के प्यार के लिए बहुत दुख सहा।

यह वही हैं, यह जीसस हैं, प्यार के अवतार।“ इंसान के बेटे ने दिव्य माँ के बेटे को गले लगाया और उनमें विलीन हो गए। श्री रामकृष्ण को ईसा मसीह के साथ अपनी पहचान का एहसास हुआ, जैसे उन्हें पहले ही काली, राम, हनुमान, राधा, कृष्ण, ब्रह्म और मोहम्मद के साथ अपनी पहचान का एहसास हो चुका था।

इस तरह उन्होंने इस सच्चाई का अनुभव किया कि ईसाई धर्म भी ईश्वर-चेतना की ओर ले जाने वाला एक रास्ता है। अपने जीवन के आखिरी पल तक उनका मानना था कि ईसा मसीह ईश्वर के अवतार थे। लेकिन उनके लिए, ईसा मसीह ही अकेले अवतार नहीं थे; और भी थे – जैसे बुद्ध और कृष्ण।

इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया तथा अशोक मुखर्जी द्वारा गाये भक्ति भावना से ओत-प्रोत समापन गीत के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ तथा संगोष्ठी में उपस्थित सभी भक्तों के बीच प्रसाद वितरण किया गया।

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