क्रिसमस की पूर्व संध्या पर रामकृष्ण मठ में उत्सव
’’ईश्वर दर्शन ही मनुष्य जीवन को उद्देश्य है - स्वामी मुक्तिनाथानन्द

लखनऊ,भारत प्रकाश न्यूज़। क्रिसमस की पूर्व संध्या पर उत्सव का आयोजन किया गया। बुधवार को रामकृष्ण एवं स्वामी विवेकानन्द के विश्वव्यापी सन्देंश अर्थात् सभी धर्मों के लिए समरसता के अनुसार दिन रामकृष्ण मठ निराला नगर में विभिन्न क्षेत्रों से आये भक्तगणों के साथ विधि-विधान से क्रिसमस उत्सव मनाया गया।
इस अवसर पर मठ परिसर में यीशु की कलात्मक छवि एवं माता मेरी की गोद में बैठे शिशु यीशु की छवि को, पार्श्व में मनोहर तरीके से विभिन्न प्रकार के पौधे, रंग-बिरगें फूल, फल, बिस्किट, केक एवं मोम बत्तियों को आकर्षक ढंग से सुसज्जित किया गया था।
इसके अलावा सेन्टाक्लाज़ की छोटी छवि भी रखी गयी थी। कार्यक्रम की शुरूआत औपचारिक पूजा एवं ध्यान के साथ-साथ आरती एवं फूल, फल, अगरबत्ती, मिठाई आदि पदार्थो के चढावें से हुयी क्रिसमस हर्ष गीत के सामूहिक गान से एक गूजदार ध्वनि उत्पन्न हुयी और साथ ही मध्य में वाद्य यन्त्रों से उत्पन्न हो रही ध्वनियों से वृहद मन्दिर परिसर में एक चमकदार आभा उत्पन्न हो गयी।
सिस्टर मीरा ने बाइबिल से यीशु की जन्मोंत्सव के संबंध में अग्रेंजी में प्रकाश डाला। तत्पश्चात रामकृष्ण मठ के स्वामी विश्वदेवानन्द द्वारा बेबी जीसस पर एक भजन की प्रस्तुति दी। यीशु द्वारा पर्वतों पर दिए गये धर्मोपदेश के मुख्य संदेश के बारे में स्वामी रमाधीशानन्द ने प्रकाश डाला।
इस अवसर पर मठ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज ने वेदान्त के आलोक से ईसा मसीह के पर्वतोपदेश के धार्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि बाइबिल में हैं ’’वे धन्य है जिनके हृदय पवित्र है कारण वे ईश्वर को दर्शन करेंगे’’ और समझाया कि यीशु के यह
शैलोपदेश सभी धर्मो का केन्द्रीय संदेश है, जैसा कि रामकृष्ण ने भी कहा है कि ’ईश्वर दर्शन ही मनुष्य जीवन को उद्देश्य है। इसलिए यह शाम रामकृष्ण मठ में पवित्र दिन के रूप में मनाया जाता है। इन सब विषयों पर रामकृष्ण मठ के अध्यक्ष ’स्वामी मुक्तिनाथानन्द ’ महाराज ने काफी विस्तार से चर्चा की।
स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज ने कहा कि जब यीशु ने पहली बार उपदेश देना शुरू किया, तो उन्होंने एक पहाड़ी पर (गलील की पहाड़ियों में से एक पर) एक बड़ी भीड़ को सम्बोधित किया। यह भाषण ’पहाड़ी उपदेश’ के नाम से जाना जाता है।
पहाड़ी उपदेश मसीह के सुसमाचार का सार है, न सिर्फ़ उन 12 शिष्यों के लिए जिन्होंने पहली बार यह संदेश सुना था। परमेश्वर ने मैथ्यू को प्रेरित किया कि वे यीशु के पहाड़ी उपदेश के शक्तिशाली और यादगार शब्दों को सभी युगों के ईसाइयों और आज हमारे लिए रिकॉर्ड करें। यह उपदेश नए नियम में पाया जाने वाला यीशु का सबसे लंबा लगातार
प्रवचन है, यह संत मैथ्यू के सुसमाचार, अध्याय 5-7 में मिलता है, और यह सबसे ज़्यादा उद्धृत किए जाने वाले उपदेशों में से एक रहा है। पहाड़ी उपदेश का मकसद उन तरीकों की पहचान करना है। जिनसे यीशु के अनुयायियों को परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर के दयालु निमंत्रण को स्वीकार करते हुए जीवन जीना चाहिए। यह उपदेश हर पीढ़ी के लिए इस महत्वपूर्ण सवाल का जवाब देता है।
मैं अभी परमेश्वर के राज्य में कैसे प्रवेश कर सकता हूँ और हमेशा के लिए उसका हिस्सा कैसे बन सकता हूँ-और मैं ऐसा क्यों करना चाहूँगा।
इसमें यीशु की कुछ सबसे प्रसिद्ध शिक्षाएँ शामिल हैं, जैसे आठ आशीषें, और व्यापक रूप से पढ़ी जाने वाली प्रभु की प्रार्थना है।
स्वामी ने कहा कि आँटपुर में स्वामी विवेकानन्द और उनके गुरुभाइयों ने ईसामसीह के आविर्भाव के पूर्वदिन अर्थात क्रिसमस ईव के दिन संन्यास जीवन का संकल्प ग्रहण किया था।
उस दिन को स्मरण करने के लिए तथा भगवान ईसा के प्रति सम्मान-प्रदर्शन के लिए स्वामी त्रिगुणातीतानन्द महाराज हर वर्ष क्रिसमस ईव की पूर्वरात्रि पर एक छोटा उत्सव करते। वास्तव में इसी का अनुसरण करते हुए आज भी बेलुड़ मठ तथा अन्य शाखा केन्द्रों में क्रिसमस ईव की संध्या नियमानुसार गम्भीर भाव-परिवेश में प्रतिपालित होती है।
स्वामी ने क्रिसमस पर अपने सम्बोधन में कहा कि रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन, जो धर्मों की एकता के एक अनोखे प्रतीक हैं। वे भी इस मौके को बहुत अच्छे तरीके से मनाते हैं।
क्रिसमस का रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन के लिए एक खास जगह है, जो इस त्योहार को अपने अनोखे अंदाज़ में मनाते हैं। असल में, मठ और मिशन की लगभग सभी शाखाओं में मुख्य मंदिर में ही यह उत्सव मनाया जाता है।
यह उत्सव शहर के किसी भी मशहूर चर्च जैसा होता है। जिसमें क्रिसमस कैरोल, मोमबत्ती जलाना, प्रार्थना और केक चढ़ाना शामिल है। मंदिर को खूबसूरती से सजाया जाता है और शिशु यीशु और भगवान यीशु की तस्वीरें एक वेदी पर रखी जाती हैं और उनकी पूजा की जाती है।
एक साधु मोमबत्तियों के साथ क्रिसमस की पूर्व संध्या पर विशेष आरती करता है और मसीह को केक और बिस्कुट चढ़ाता है।
कैरोल गाए जाते हैं जिसके बाद एक साधु छोटा भाषण देता है।
रामकृष्ण मिशन का क्रिसमस की पूर्व संध्या से बहुत खास जुड़ाव है। साल 1886 में रामकृष्ण के इस दुनिया से जाने के लगभग चार महीने बाद, स्वामी विवेकानंद अपने आठ शिष्यों के साथ पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के अंतपुर नाम के एक गांव में इकट्ठा हुए, यह उनके एक भाई शिष्य की मां मातंगिनी देवी के बुलावे पर था।
उन्हें नहीं पता था कि वह क्रिसमस की पूर्व संध्या थी। सूरज डूबने के बाद उन्होंने आग जलाई, जिसे पारंपरिक हिंदू साधु धूनी कहते हैं और उसके चारों ओर बैठकर ध्यान किया। काफी देर तक ध्यान करने के बाद स्वामी विवेकानन्द ने अपनी आंखें खोलीं और यीशु मसीह के असाधारण जीवन और बलिदान और अपने मसीह जैसे गुरु रामकृष्ण के बारे में बात की।
जिस स्थिति में वे तब थे, जब उन्होंने अपने गुरु रामकृष्ण को मानवता के उद्धार के लिए अपनी आंखों के सामने मरते देखा था, वह वैसी ही स्थिति थी जैसी यीशु मसीह के शिष्यों की थी जब मसीह क्रॉस पर मर गए थे।
इस समानता को स्वामी विवेकानन्द ने महसूस किया, जो पीटर और पॉल दोनों जैसे थे।
उन्होंने अपने भाई साधुओं से आग को साक्षी मानकर त्याग और सेवा का संकल्प लेने का आग्रह किया। अगली सुबह उन्हें एहसास हुआ कि पिछली शाम पवित्र क्रिसमस की पूर्व संध्या थी। मद्रास (अब चेन्नई) में मायलापुर रामकृष्ण मठ में ऐसे ही एक उत्सव के दौरान स्वामी ब्रह्मानंद को मसीह का दर्शन होने का एक रिकॉर्ड है।
इस कार्यक्रम का समापन क्रिसमस के हर्ष गीत ‘‘हार्क द हेराल्ड एंजल्स सिंग एवं साइलेंट नाइट, होली नाइट’’ के सामूहिक गान से हुआ, साथ ही साथ क्रिसमस के केक आदि का वितरण हुआ। पूरे कार्यक्रम में जो भी युवा एवं बजुर्गो ने भाग लिया उनके दिलों दिमाग पर इस कार्यक्रम ने एक अमिट प्रभाव छोड़ दिया।



