राम कृष्ण मठ में स्वामी विवेकानन्द जयन्ती समारोह
राष्ट्रीय एकता के सूत्रधार-स्वामी विवेकानन्द पर आधारित समारोह

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। राष्ट्रीय एकता के सूत्रधार-स्वामी विवेकानन्द पर आधारित समारोह आयोजन किया जा रहा है। शनिवार को राम कृष्ण मठ में अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द के मार्ग दर्शन में 9 दिवसीय
स्वामी विवेकानन्द की 164वीं जन्मतिथि समारोह का आयोजन किया गया। जिसे समस्त कार्यक्रम हमारे यूट्यूब चैनेल : ‘रामकृष्ण मठ लखनऊ’ के माध्यम से सीधा प्रसारित किया गया।
कार्यक्रम के आठवें दिन, कार्यक्रम की शुरूआत प्रातः 5 बजे श्री ठाकुर जी की मंगल आरती से हुई। तत्पश्चात प्रातः 6ः50 बजे वैदिक मंन्त्रोच्चारण मठ के स्वामी इष्टकृपानन्द द्वारा किया गया तथा प्रातः 7ः15 बजे स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज द्वारा (ऑनलाइन धार्मिक प्रवचन) सत प्रसंग किया।
संध्यारति के उपरांत मठ के प्रेक्षागृह में स्थानीय रामकृष्ण सेवा समिति द्वारा लीलागीति का आयोजन किया गया। जहाँ पर स्थानीय कलाकारों द्वारा अद्भुत शैली का प्रदर्शन किया गया।
रामकृष्ण सेवा समिति के दस कलाकार के एक समूह ने यह लीला गीति प्रस्तुत किया। जिसका विषय था ’राष्ट्रीय एकता के सूत्रधार-स्वामी विवेकानन्द’। लीला गीति के लिपि प्रस्तुत कारक सुखदराम पांडे ने उल्लेख किया कि स्वामी विवेकानन्द भारतीय राष्ट्रीयता के जनक हैं।
सी. राजगोपालाचारी ने कहा था कि यदि स्वामी न होते तो हम अपनी राष्ट्रीयता के साथ अपना धर्म भी खो देते। वे धर्म के भी प्रतिष्ठाता थे और राष्ट्रीयता के भी। राष्ट्र उनके लिये धर्मपुरुष और धर्म उनके लिये राष्ट्रपुरुष था।
स्वामी का भारत जड़ भौगोलिक इकाई नहीं है, यह एक जीवंत जाग्रत देवता है। यह व्यक्ति का विस्तार है। इसीलिए स्वामी ने व्यक्ति के विकास को देश के विकास का आधार माना है एकीकृत एवं पूर्ण विकसित व्यक्ति राष्ट्र एवं मानवता का सर्वोत्तम प्रतिनिधि है।
यही कारण है कि उन्होंने श्रीरामकृष्ण परमहंस को पूर्णता प्राप्त व्यक्ति के उदाहरण के रूप में देश और मानवता के समक्ष प्रस्तुत किया। ऐसा व्यक्ति जो सर्वकल्याण के लिये स्वयं का उत्सर्ग कर दे, वह सारी सृष्टि का आदर्श है।
राष्ट्रनिर्माण के स्तम्भ के रुप में सर्वत्यागी महापुरुष श्रीरामकृष्ण का अभ्युदय हमारी एकता और राष्ट्रीयता की अनमोल धरोहर है। समाज में ऐसे त्यागी पुरुषों के अधिकाधिक उन्नयन से अभिन्नता की भावना दृढ़ होती है।
भेदभाव पशुता की निशानी है और अभेदत्व देवत्व की। हमें पशु की श्रेणी से ऊपर उठकर देवमानव बनना है। देना हमारा दायित्व है,लेने की वृत्ति आदमी को कीणा बना देती है। उपभोक्तावाद की संस्कृति मनुष्यता की विरोधी है,दूसरे का हक़ छीनकर अपना पेट भरने वाला आदमी दूसरे को मारकर खाने वाले पशु के समान है।
स्वामी ने दूसरे के लिये जीने और जरूरत पड़ने पर अन्य के तनिक कल्याण के लिये भी अपना जीवन दे देने वाले मनुष्य को ही यथार्थ जीवित कहा हैं अपने लिये जीने वाले उपभोक्ताओं का समाज श्मशान अर्थात मुर्दाघाट के समान निष्तब्ध निष्क्रियता और मौत के सन्नाटे का पर्याय है।
सारे भेद संसार की अनेकता के पर्याय हैं, जबकि सत्य एकता का दर्शन है. सत्य अनेकता में एकता है। इसी को आधार बनाकर समाज की विभिन्न धाराओं को अंतरधारा के रूप में एकता के सूत्र में पिरोया जा सकता है।
स्वामी सत्य स्वरूप हैं, इसीलिए वे एकता के सूत्रधार हैं। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय – दोनों स्तरों पर यह एकता आज की सबसे बड़ी अवश्यकता है, अन्यथा मनुष्य – समाज को सुरक्षित रख पाना संभव नहीं होगा।
लीलागीति का मंच पर वाचन समर नाथ निगम द्वारा किया गया लीला गीति की संगीतमय प्रस्तुति के मुख्य परिचालक अनिमेष मुखर्जी द्वारा कुल 10 भजनों का परिचालन किया गया। उनके नेतृत्व में अन्य गायकों में सुब्रत गांगुली, जॉय चक्रवर्ती,
औलिक सरकार, सौरव गांगुली, प्रणब भट्टाचार्य ने विभिन्न भजन प्रस्तुत किया। कभी एकक रूप से, कभी सामूहिक रूप से उस दौरान तबले में संगत भातखण्डे संगीत संस्थान के शुभम राज एवं मंजीरा अजीत त्रिवेदी ने किया।
वहीं
अनुष्ठान के उपरां मठ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज ने मनोरम प्रस्तुति के लिए कलाकारों को धन्यवाद ज्ञापित कर प्रत्येक कलाकारगण को स्वामी विवेकानन्द की पुस्तक, पुष्प पौधे एवं टेबल कैलेण्डर देकर करके सम्मानित किया।
लीलागीति की अद्भुत प्रस्तुति सब दर्शकों को मोहित कर दिया अंत में उपस्थित दर्शकवृन्द के बीच प्रसाद वितरण के माध्यम से कार्यक्रम का समापन हुआ।



