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पिता की हत्या करने के बाद शव के टुकड़े कर ठिकाने लगाता रहा आरोपी 

कलयुगी बेटे की मानसिकता ने घर की खुशियां मातम में बदली

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। राजधानी में बेटे द्वारा पिता की हत्या की घटना ने हर किसी को झकझोर दिया है। जहाँ राजधानी के आशियाना इलाके का वह मकान बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखता था।

दरवाजा बंद था, खिड़कियां भी रोज की तरह ही। लेकिन अंदर एक ऐसा सन्नाटा पसरा था, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। 49 वर्षीय मानवेंद्र सिंह एक पिता, एक कारोबारी, एक जिम्मेदार अभिभावक अब इस दुनिया में नहीं थे। उनकी मौत किसी हादसे में नहीं, बल्कि उसी बेटे के हाथों हुई, जिसे उन्होंने सपने दिखाए थे।

सपनों के दबाव में रिश्तों में बनी दरार..

परिवार वालों और पुलिस के मुताबिक, पिता अपने 21 वर्षीय बेटे अक्षत प्रताप सिंह पर नीट की तैयारी का दबाव बना रहे थे। अक्षत बीबीए का छात्र था, लेकिन पिता चाहते थे कि वह डॉक्टर बने। 20 फरवरी की सुबह घर की चारदीवारी के भीतर पिता-पुत्र के बीच बहस हुई। बहस इतनी बढ़ी कि गोलियों की आवाज ने एक परिवार को हमेशा के लिए तोड़ दिया।

बहन की आंखों में डर का साया..

गोली चलने की आवाज सुनकर छोटी बहन कृति कमरे में पहुंची। सामने पिता का निर्जीव शरीर पड़ा था। उस क्षण की दहशत उसकी आंखों में जम गई। बताया जाता है कि भाई ने उसे धमकाकर चुप करा दिया। चार दिन तक वह उसी घर में बंद रही—जहां एक तरफ पिता की लाश थी और दूसरी तरफ भाई का खौफ।

पड़ोसियों को गुमराह करता रहा आरोपी..

हत्या के बाद आरोपी ने जो किया, उसने इस घटना को और भी दर्दनाक बना दिया। शव को ठिकाने लगाने की कोशिश, टुकड़े करना, ड्रम में छिपाना—ये सब उस मानसिक उथल-पुथल की कहानी कहते हैं, जहां रिश्ते और संवेदनाएं कहीं पीछे छूट गईं।पड़ोसियों को बताया गया कि पिता दिल्ली गए हैं। गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज कराई गई। लेकिन सीसीटीवी फुटेज ने सच्चाई की परतें खोल दीं।

यह घटना सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि उन अनकहे दबावों की भी कहानी है जो कई घरों में पल रहे होते हैं। सपनों का बोझ कब संवाद की जगह ले लेता है, और कब रिश्तों की डोर इतनी कमजोर हो जाती है कि एक पल का गुस्सा जिंदगी छीन लेता है। यह कोई नहीं जान पाता। आज वह घर पुलिस की जांच का हिस्सा है।

एक पिता की चिता सजेगी, एक बेटा सलाखों के पीछे है, और एक बेटी की आंखों में हमेशा के लिए वह दृश्य कैद हो गया है। यह कहानी सिर्फ अपराध की नहीं, टूटते संवाद और बिखरते विश्वास की भी है। जिसमें पिता अपने परिवार को आगे बढ़ने के प्रेरित किया।

जिसका खामियाजा मौत से चुकाना पड़ा। इससे हर वह पिता के जुबान पर एक सवाल गूंज रहा है क्या अपने बच्चों को टोकना समझाना गलत है। इस कलयुगी बेटे ने भारतीय सभ्यता संस्कृति को मिटाने का जो घिनौना कार्य किया है। समाज कभी भी माफ नहीं करेगा।

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