उत्तर प्रदेशधर्म-अध्यात्मबड़ी खबर

 स्वामी विवेकानंद केवल एक संत ही नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माता- मुक्तिनाथानंद

 स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन कल

 

लखनऊ,भारत प्रकाश न्यूज़। स्वामी विवेकानंद अद्वितीय सन्त, राष्ट्रनिर्माता, युवाओं के प्रेरणास्रोत और मानवता के महान उपासक थे। रविवार को यह बातें निराला नगर स्थित रामकृष्ण मठ में

“स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन की पूर्व सन्ध्या पर मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द के विचार व्यक्त करते हुए कही। उन्होंने कहा कि

भारत की आध्यात्मिक चेतना को विश्व मंच पर प्रतिष्ठित करने वाले महापुरुष स्वामी विवेकानंद केवल एक संत ही नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माता, युवाओं के प्रेरणास्रोत और मानवता के महान उपासक थे। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ।

बचपन में उनका नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त एक प्रतिष्ठित वकील और माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। बाल्यकाल से ही नरेंद्र विलक्षण बुद्धि, निर्भीक स्वभाव और जिज्ञासु प्रवृत्ति के धनी थे।

उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बीए की शिक्षा प्राप्त की और पश्चिमी दर्शन, साहित्य एवं विज्ञान का गहन अध्ययन किया। अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द ने कहा कि गुरु कृपा से स्वामी का जीवन परिवर्तन

सन् 1881 में रामकृष्ण परमहंस से भेंट ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। गुरु के सान्निध्य में उन्हें आत्मज्ञान की अनुभूति हुई और उन्होंने संन्यास धारण कर“स्वामी विवेकानंद”नाम ग्रहण किया। अल्प आयु में ही उन्होंने सांसारिक मोह त्यागकर मानव सेवा को ही अपना लक्ष्य बना लिया।

  शिकागो में भारत की विजयगाथा का वर्णन..

सन् 1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में उनका ऐतिहासिक भाषण आज भी विश्व इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। उनके शब्द “सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका” सुनते ही पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। उस एक भाषण ने भारत की आध्यात्मिक गरिमा को विश्व के सामने स्थापित कर दिया।

सेवा, साधना का संगम..

उन्होंने 1897 में रामकृष्ण मठ एवं रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य “नर सेवा ही नारायण सेवा”। उन्होंने बताया कि शिक्षा, सेवा, राष्ट्रनिर्माण, चरित्र निर्माण और मानवता के उत्थान को उन्होंने अपने मिशन का केंद्र बनाया।

वेदांत और योग को पश्चिमी जगत में लोकप्रिय कर उन्होंने भारत की सांस्कृतिक शक्ति को वैश्विक पहचान दिलाई। स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति और पश्चिमी विचारों के बीच अद्भुत समन्वय स्थापित किया।

उनका संदेश “उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत”आज भी युवाओं में आत्मविश्वास, साहस और राष्ट्रप्रेम की अलख जगा रहा है। मठ अध्यक्ष ने कहा कि

4 जुलाई 1902 को मात्र 39 वर्ष की आयु में उनका महाप्रयाण हो गया, किंतु उनके विचार आज भी करोड़ों युवाओं के जीवन को दिशा दे रहे हैं। स्वामी जी का उद्घोष “उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको। आज भी साहस से जनमानस को भर देता है। स्वामी के अमर वाक्य

” सेवा ही ईश्वर है। तथा निस्वार्थ कर्म ही सच्ची साधना है एवं आत्मविश्वास और चरित्र निर्माण से राष्ट्र का उत्थान संभव है। सबको प्रेरित करते है।

स्वामी विवेकानंद केवल इतिहास नहीं, बल्कि आज भी भारत की चेतना, आत्मबल और नवचेतना के प्रतीक हैं। उनके विचारों को आत्मसात कर ही एक सशक्त, संस्कारित और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण संभव है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button