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तुरीय कोई नींद नहीं, बल्कि महा-जागरण- मुक्तिनाथानन्द 

तुरीय अवस्था को चार अवस्थाओं में समझाया 

 

लखनऊ,भारत प्रकाश न्यूज़। आध्यात्मिक कथा के विशेषताओ का वर्णन किया गया। रविवार को

प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने रामकृष्ण कथामृत के 25 अक्टूबर 1885 के एक प्रसंग सुनाते हुए कहा उस दिन ठाकुर

रामकृष्ण परमहंस देव कैंसर से पीड़ित होते हुए भी श्यामपुकुर में भक्तों को ब्रह्म-ज्ञान की बात समझा रहे थे। स्वामी तुरीय अवस्था को सरल भाषा में चार अवस्थाओं का वर्णन किया। जिसमें

पहला जाग्रत जब हम इंद्रियों से इस स्थूल जगत को देखते हैं। मैं शरीर हूँ, यह भाव। दूसरा स्वप्न जब मन ही सूक्ष्म जगत रचता है। नींद में सपने देखना। सुषुप्ति गहरी नींद, जहाँ कुछ भी भान नहीं रहता, केवल आनंद का आवरण रहता है।

इन तीनों का हम रोज अनुभव करते हैं, पर ये तीनों परिवर्तनशील हैं।. चौथा तुरीय ये चौथी अवस्था है। ‘तुरीय’ का अर्थ ही है – चौथा। यह जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों का साक्षी है, आधार है। रामकृष्ण इसे ‘समाधि’, ‘भावातीत’ अवस्था कहते थे।

तुरीय कोई नींद नहीं, बल्कि महा-जागरण है। इसमें जीव अहंभाव मिट जाता है और वह ब्रह्म के साथ एकाकार का अनुभव करता है। यह मन-बुद्धि से परे है, केवल अनुभूति का विषय है। *ठाकुर कहते थे।

नमक की पुतली समुद्र नापने गई और उसी में गल गई। वैसे ही अहं के लय होने पर ही तुरीय का बोध होता है। स्वामी समझाते हैं कि कथामृत पढ़ना केवल कहानी पढ़ना नहीं, बल्कि स्वयं को उस तुरीय चेतना की ओर ले जाने का अभ्यास है।

स्वामी तुरीय अवस्था की दो सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं को समझा रहे हैं – उसकी अगम्यता और उसकी स्थायित्व। तुरीय की अप्राप्य प्रकृति

स्वामी कहते हैं कि जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति – ये तीनों अवस्थाएं मन और बुद्धि के दायरे में आती हैं, इसलिए हम इनका वर्णन कर सकते हैं। पर तुरीय मन-बुद्धि से परे है। उपनिषद कहते हैं।

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह’ जहाँ से वाणी और मन लौट आते हैं, उसे न पाकर। तुरीय ठीक वही है। वहाँ तक हमारा तर्क, हमारा शब्द नहीं पहुँच सकता। वह कोई कल्पना या भावुकता नहीं, बल्कि शुद्ध, निर्मल आनंद और ईश्वरीय अनुभूति का लोक है।

रामकृष्ण कहते थे, “ब्रह्म क्या है, मुख से नहीं कहा जा सकता।” जैसे गूंगा गुड़ खाकर केवल मुस्कुराता है, मिठास बता नहीं पाता, वैसे ही तुरीय में पहुँचा योगी केवल आनंद में मग्न रह जाता है।

स्मृति और स्थायित्व का सुंदर दृष्टांत..

इसे समझाने के लिए स्वामी ब्लैकबोर्ड पर लिखने का अद्भुत उदाहरण देते हैं। जाग्रत अवस्था – खड़िया से लिखना जैसे खड़िया से लिखा हुआ कुछ देर रहता है। फिर मिट जाता है।

दिन भर के जाग्रत के अनुभव हमें याद रहते हैं पर समय के साथ धुंधले पड़ जाते हैं। स्वप्न अवस्था पानी से लिखना जैसे पानी से बोर्ड पर लिखो तो लिखते ही मिट जाता है। सपना टूटते ही 90% भूल जाता है।

तुरीय अवस्था नक्काशी खोदना जैसे लकड़ी या पत्थर पर नक्काशी खोद दी जाए, वह स्थायी बन जाती है। कभी नहीं मिटती।

तुरीय की अनुभूति ऐसी ही है। एक बार यदि ईश्वर का साक्षात्कार हो गया, तो वह संस्कार आत्मा पर सदा के लिए खुद जाता है।

संसार की हजार वासनाएं भी उसे मिटा नहीं सकतीं। यही कारण है कि ठाकुर के पार्षदों का जीवन एक क्षण के स्पर्श से हमेशा के लिए बदल गया था।

स्वामी तुरीय भाव-समाधि की सबसे प्रत्यक्ष अनुभूति को समझा रहे हैं। नियंत्रण का छूट जाना। सामान्य अवस्था में हमारा अहंकार मन का मालिक बना रहता है।

हम हिसाब लगाते हैं, सोचते हैं, मन को काबू में रखने की कोशिश करते हैं। पर जब ईश्वरीय शक्ति का आवेश आता है, तो यह छोटा ‘मैं’ टिक नहीं पाता। इसे ठाकुर दो उपमाओं से कहते थे – जैसे बिजली का ओवरपॉवरिंग चार्ज लग जाए।

440 वोल्ट छूने पर शरीर पर आपका काबू नहीं रहता, वैसे ही ब्रह्म-चेतना के स्पर्श से मन-बुद्धि निष्क्रिय हो जाते हैं। दूसरी उपमा जैसे किसी में भूत आ जाए।

भूताविष्ट व्यक्ति जैसे अपने वश में नहीं रहता, वैसे ही योगी ईश्वरीय भाव में अपने वश में नहीं रहता।

स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि तुरीय अवस्था के क्षण संसार के सारे हिसाब-किताब, चिंता, वासना एकदम गायब हो जाते हैं। हृदय में केवल ईश्वर ही रह जाता है, और कोई सांसारिक विचार ठहर ही नहीं पाता।

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